Politics
कुर्सी स्थायी नहीं, लोकतंत्र स्थायी है
कुर्सी स्थायी नहीं, लोकतंत्र स्थायी है सत्ता को तस्वीरों से नाराज़ होने के बजाय उनमें छिपे सवालों को पढ़ना चाहिए लोकतंत्र में सरकारें आती हैं और जाती हैं, लेकिन लोकतंत्र किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं होता। सत्ता का अधिकार जनता कुछ वर्षों के लिए सौंपती है, जबकि संविधान उस अधिकार की सीमाएं और नागरिकों के अधिकार स्थायी रूप से निर्धारित करता है। कुर्सी पर बैठने का अधिकार जनता देती है, लेकिन उसी जनता को सवाल पूछने से रोकने का अधिकार किसी सरकार को नहीं मिलता। आज देश में सामने आ रही तस्वीरों को केवल राजनीतिक विरोध, प्रदर्शन या सत्ता-विरोधी गतिविधि कहकर खारिज कर देना आसान है। लेकिन तस्वीरें कई बार शब्दों से कहीं अधिक बोलती हैं। उनमें खड़े युवा केवल भीड़ का हिस्सा नहीं होते; वे अपने समय की बेचैनी, उम्मीद और सवालों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। जब किसी पीढ़ी को यह महसूस होने लगे कि उसकी बात सुनी नहीं जा रही, तो सड़क पर उठती आवाजों को केवल शोर समझना लोकतंत्र की आत्मा को न समझना है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का भविष्य क्या होगा, सरकार रहेगी या बदलेगी—इन प्रश्नों का उत्तर आज किसी के पास नहीं है। मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे गंभीर आरोपों में क्या सही हुआ और क्या गलत, इसका अंतिम निर्धारण राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि तथ्यों, संवैधानिक प्रक्रिया और आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक परीक्षण से होना चाहिए। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि आरोप लगाने का अधिकार भी है और आरोपों की अंतिम कसौटी कानून भी। लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या लोकतंत्र में जनता के सवालों के प्रति सत्ता का रवैया लोकतांत्रिक है? लोकतंत्र केवल मतदान के दिन पैदा होकर पांच साल बाद खत्म नहीं होता। मतदाता का अधिकार केवल मतदान केंद्र तक सीमित नहीं है। वह सवाल पूछ सकता है, जवाब मांग सकता है, नीतियों की आलोचना कर सकता है और शांतिपूर्ण असहमति दर्ज करा सकता है। सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं होती और किसी नीति पर सवाल उठाना राष्ट्रविरोध नहीं हो सकता। स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति व्यवस्था की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण होती है। सत्ता के पास पुलिस, प्रशासन, सरकारी संसाधन और संस्थागत ताकत होती है। जनता के पास सबसे बड़ी ताकत उसकी आवाज और उसका वोट है। इसलिए जब जनता सवाल लेकर सामने आती है तो लोकतांत्रिक सरकार की पहली जिम्मेदारी उस आवाज को सुनना है, उसे संदिग्ध या शत्रु मान लेना नहीं। खासकर युवाओं के सवालों को समझने की जरूरत है। सड़क पर खड़ा युवा जरूरी नहीं कि व्यवस्था के खिलाफ हो; संभव है वह व्यवस्था से इसलिए सवाल कर रहा हो क्योंकि उसे उससे उम्मीद है। जो युवा व्यवस्था से पूरी तरह निराश हो जाता है, वह कई बार सवाल पूछना भी छोड़ देता है। लेकिन जो युवा सड़क पर खड़ा होकर जवाब मांगता है, वह अभी लोकतंत्र पर भरोसा कर रहा है। इसलिए इन तस्वीरों को दबाने या नजरअंदाज करने के बजाय उन्हें पढ़ने की जरूरत है। वे आने वाले भारत की मनःस्थिति का संकेत हो सकती हैं। आज सत्ता के पास बहुमत है तो कल समीकरण बदल भी सकते हैं। आज जो सरकार में हैं, कल विपक्ष में हो सकते हैं और आज जो विपक्ष में हैं, वे भविष्य में सत्ता में आ सकते हैं। यही लोकतंत्र का चक्र है। इसलिए सत्ता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि कुर्सी स्थायी है। कुर्सी आपकी हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र आपका नहीं है। लोकतंत्र जनता का है। इसीलिए असहमति और दुश्मनी के बीच अंतर समझना जरूरी है। चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे अधिक पारदर्शी बनाने की मांग भी हो सकता है—बशर्ते सवाल तथ्य और कानून के दायरे में हों और उनका परीक्षण सक्षम संवैधानिक संस्थाएं करें। मतदाता सूची से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो तथ्य सामने आने चाहिए और यदि कहीं अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं है जब सवाल उठते हैं; सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। सोशल मीडिया के दौर में सत्ता को इस बदलती हुई जन-मनोविज्ञान को भी समझना होगा। आज का युवा केवल सरकारी विज्ञापन नहीं देखता। वह दस्तावेज खोजता है, आंकड़े जांचता है, वीडियो देखता है और अपनी राय बनाता है। वह पूछता है—रोजगार के कितने वादे पूरे हुए? बजट कितना था और जमीन पर कितना पहुंचा? योजनाओं का लाभ किसे मिला? और लोकतंत्र में उसकी आवाज की वास्तविक कीमत कितनी है? इन सवालों का जवाब जब संतोषजनक नहीं मिलता, तो सड़क पर तस्वीरें बनती हैं। आंदोलन की तस्वीरें बनती हैं। प्रतिरोध की तस्वीरें बनती हैं। और समय बीतने के साथ यही तस्वीरें इतिहास का दस्तावेज बन जाती हैं। इतिहास यह नहीं पूछता कि उस समय सत्ता कितनी शक्तिशाली थी। इतिहास यह पूछता है कि उस शक्ति का इस्तेमाल किसके लिए किया गया—जनता के लिए या जनता पर? सरकारें उपलब्धियों के विज्ञापन छपवा सकती हैं, मंच सजा सकती हैं, भाषण दे सकती हैं और आंकड़ों की लंबी फेहरिस्त सामने रख सकती हैं। लेकिन जनता के मन में पैदा हुआ सवाल किसी विज्ञापन से समाप्त नहीं होता। सवाल का उत्तर देना ही पड़ता है। मुख्य चुनाव आयुक्त का भविष्य क्या होगा, यह संविधान, कानून, न्यायिक प्रक्रिया और समय तय करेंगे। सरकार का भविष्य क्या होगा, यह अंततः जनता तय करेगी। लेकिन इन दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण है—लोकतंत्र में जनता का विश्वास। यदि यह विश्वास कायम रहा तो सरकारें बदलती रहेंगी, सत्ता के चेहरे बदलते रहेंगे और देश अपनी लोकतांत्रिक यात्रा जारी रखेगा। लेकिन यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि उसके वोट की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है, उसकी आवाज की कोई कीमत नहीं और उसके सवालों पर पहरा है, तो संकट किसी एक सरकार या किसी एक संस्था का नहीं रहेगा। वह लोकतंत्र के भरोसे का संकट बन जाएगा। इसलिए आज सामने आती तस्वीरों को देखकर सत्ता को गुस्सा नहीं, आत्ममंथन करना चाहिए। तस्वीर में खड़ा युवा सत्ता का दुश्मन नहीं है। वह आपका मतदाता है। वह मतदाता कल फिर मतदान केंद्र पर आएगा। उसके हाथ में वही वोट होगा, लेकिन उसके साथ आज की तस्वीरों की स्मृति भी होगी। क्योंकि सत्ता बदल जाती है, तस्वीरें रह जाती हैं। सरकारें चली जाती हैं, सवाल रह जाते हैं। और जब सवाल जनता के हों, तो किसी भी सत्ता के पास उनसे हमेशा बच निकलने की कोई सुरक्षित जगह नहीं होती। लोकतंत्र में सबसे बड़ी कुर्सी सत्ता की नहीं, जनता की होती है।