Politics
वोट के बाद भी जागना होगा, दिया है वोट तो हिसाब भी लो!
वोट के बाद भी जागना होगा, दिया है वोट तो हिसाब भी लो! ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ महज एक नारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही की मांग का प्रतीक है। लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत तभी सामने आती है, जब मतदाता मतदान के बाद भी अपने अधिकारों, कर्तव्यों और जनप्रतिनिधियों के कामकाज के प्रति सजग रहता है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ आरपी यादव/ब्यूरो/तेजसबिंदु ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ लोकतंत्र में वोट की कीमत केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं होती। एक मत सरकारों की दिशा बदल सकता है, सत्ता के समीकरण प्रभावित कर सकता है और जनप्रतिनिधियों के भविष्य का फैसला कर सकता है। लेकिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मतदान केंद्र से बाहर निकलते ही नागरिक की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? क्या पांच साल के लिए अपना प्रतिनिधि चुन लेने के बाद जनता को अगले चुनाव तक उसकी जवाबदेही से मुक्त हो जाना चाहिए? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ नहीं! लोकतंत्र में मतदान अंत नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी की शुरुआत है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ जैसे नारे उस समय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं, जब चुनावी प्रक्रिया, मताधिकार या लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठते हैं। ऐसे सवालों का समाधान केवल नारों और आरोपों से नहीं, बल्कि तथ्यों, प्रमाणों, पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि हर गंभीर आरोप की निष्पक्ष जांच हो, हर वैध सवाल का जवाब मिले और जनता का विश्वास बना रहे। लेकिन लोकतंत्र की चिंता केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं हो सकती। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिस प्रतिनिधि को जनता अपना बहुमूल्य वोट देकर सदन या सरकार तक पहुंचाती है, क्या वह पांच साल तक जनता के प्रति जवाबदेह बना रहता है? और क्या मतदाता उससे हिसाब मांगने की अपनी जिम्मेदारी निभाता है? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ मतदान के बाद क्यों सो जाती है जनता? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ हमने मतदाता जागरूकता का अर्थ बहुत सीमित कर दिया है। चुनाव आते हैं, प्रचार अभियान चलते हैं, राजनीतिक दल मतदान की अपील करते हैं और नागरिकों को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जाता है। मतदान प्रतिशत बढ़ने पर लोकतंत्र की मजबूती की चर्चा होती है। यह सब जरूरी है, लेकिन लोकतंत्र की पूरी तस्वीर नहीं है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ मतदान लोकतंत्र का प्रवेशद्वार है, उसकी संपूर्णता नहीं। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ लोकतंत्र की असली परीक्षा मतदान के बाद शुरू होती है। जिस जनता ने अपने प्रतिनिधि को चुनकर सत्ता सौंपी, क्या वह उसके कामकाज पर नजर रखती है? क्या वह पूछती है कि चुनाव के दौरान किए गए वादों का क्या हुआ? कितनी योजनाएं पूरी हुईं, कितनी अधूरी रह गईं और कितनी घोषणाएं केवल भाषणों तक सिमटकर रह गईं? जिस सड़क का उद्घाटन हुआ, उसकी गुणवत्ता कैसी है? जिस अस्पताल को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बताया गया, वहां डॉक्टर, दवाएं और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं? जिस विद्यालय की तस्वीर विकास के प्रमाण के रूप में दिखाई गई, वहां शिक्षक नियमित आते हैं या नहीं? जिन युवाओं को रोजगार देने का वादा किया गया, उनके लिए कितने अवसर पैदा हुए? किसानों, मजदूरों, महिलाओं और छोटे कारोबारियों की समस्याओं पर कितना काम हुआ? ये सवाल किसी राजनीतिक दल के विरोध में नहीं, बल्कि जनता के हित में पूछे जाने चाहिए। क्योंकि जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन उसके भाषणों, नारों और प्रचार से नहीं, बल्कि उसके कामकाज और सार्वजनिक जवाबदेही से होना चाहिए। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जनता मालिक है, जनप्रतिनिधि जवाबदेह ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता का सेवक और प्रतिनिधि होता है। उसे अधिकार जनता के विश्वास और संवैधानिक व्यवस्था से मिलते हैं। लेकिन जब नागरिक अपने प्रतिनिधि के कामकाज का हिसाब मांगना छोड़ देता है, तब प्रतिनिधित्व और जवाबदेही के बीच की दूरी बढ़ने लगती है। सत्ता चाहे किसी भी दल के पास हो, उससे सवाल पूछना नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। सरकार की अच्छी योजनाओं की सराहना करना और गलत नीतियों, अधूरे वादों या प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठाना—दोनों ही जागरूक नागरिकता के हिस्से हैं। लोकतंत्र का अर्थ केवल सरकार चुनना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए रखना भी है जिसमें सरकार जनता के प्रति जवाबदेह रहे। बहुमत से सरकार बन सकती है, लेकिन बहुमत किसी सरकार को सवालों से परे नहीं कर देता। चुनाव में मिली जीत जनादेश है, जनता की आवाज को अनसुना करने का अधिकार नहीं। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जनता के पैसे का हिसाब कौन मांगेगा? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ सरकारी योजनाओं पर खर्च होने वाला धन किसी नेता या अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं है। वह सार्वजनिक संसाधनों का हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल जनता के हित में होना चाहिए। इसलिए उस धन के उपयोग, योजनाओं की प्रगति और कार्यों की गुणवत्ता के बारे में जानकारी मांगना नागरिक का अधिकार है। ग्राम पंचायत की सड़क हो या नाली का निर्माण, नल-जल योजना हो या आवास योजना, विद्यालय का भवन हो या कोई बड़ी सरकारी परियोजना—हर जगह यह देखना जरूरी है कि कागज पर दर्ज काम जमीन पर भी हुआ है या नहीं। यहीं पर नागरिक निगरानी, सामाजिक अंकेक्षण और सूचना का अधिकार जैसे माध्यमों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामसभा की बैठकों में भाग लेना, सार्वजनिक अभिलेखों की जानकारी प्राप्त करना, योजनाओं के खर्च का विवरण मांगना और अनियमितता के प्रमाण मिलने पर सक्षम अधिकारियों के समक्ष शिकायत करना लोकतांत्रिक भागीदारी के व्यावहारिक रूप हैं। लोकतंत्र केवल संसद और विधानसभा में ही नहीं चलता। उसकी नींव गांव की ग्रामसभा, नगर निकाय की बैठक, पंचायत के सार्वजनिक अभिलेख और आम नागरिक के सवालों में भी दिखाई देती है। यदि जनता अपने आसपास हो रहे विकास कार्यों की निगरानी करे, तो सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ सकती है। लेकिन यदि नागरिक उदासीन बना रहे, तो जवाबदेही की व्यवस्था कमजोर पड़ने का खतरा बना रहता है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ अपना जन-घोषणापत्र क्यों नहीं? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ राजनीतिक दल चुनाव के समय अपना घोषणा-पत्र जारी करते हैं। उसमें विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और सामाजिक कल्याण के वादे किए जाते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है—पिछले चुनाव में किए गए वादों का हिसाब कौन मांगता है? मतदाता को अब केवल नए वादों से प्रभावित होने के बजाय पुराने वादों की समीक्षा करने की आदत विकसित करनी होगी। उम्मीदवारों से पूछा जाना चाहिए कि पिछले कार्यकाल में उन्होंने क्या किया, किन समस्याओं को उठाया, किन योजनाओं को आगे बढ़ाया और किन वादों को पूरा नहीं कर सके। इसके साथ ही जनता अपना स्थानीय जन-घोषणापत्र भी तैयार कर सकती है। गांव के लोग तय करें कि अगले पांच साल में उनकी प्राथमिकताएं क्या होंगी। शहर के नागरिक शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, यातायात और पेयजल से जुड़ी अपनी जरूरतों को सामने रखें। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएं और युवा अपनी समस्याओं तथा अपेक्षाओं को लिखित रूप दें। फिर सभी उम्मीदवारों से पूछा जाए कि वे इन मुद्दों पर क्या योजना रखते हैं और अपने वादों की प्रगति के बारे में जनता को किस तरह जानकारी देंगे। इससे चुनाव केवल चेहरों, जातीय समीकरणों, धार्मिक भावनाओं और राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं रहेगा। चर्चा विकास, नीतियों, सार्वजनिक सेवाओं और जवाबदेही पर केंद्रित हो सकेगी। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ समर्थन भी, सवाल भी—यही लोकतंत्र है ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ किसी सरकार की आलोचना करना ही जागरूक नागरिकता नहीं है। सरकार यदि जनहित में अच्छा काम करती है, तो उसकी सराहना भी होनी चाहिए। लेकिन समर्थन का अर्थ सवाल पूछने का अधिकार छोड़ देना नहीं है और विरोध का अर्थ तथ्यों की अनदेखी करना भी नहीं होना चाहिए। मतदाता को व्यक्ति या दल के प्रति अंधसमर्थन से बचते हुए नीतियों और कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए। चुनाव के समय जाति, धर्म, क्षेत्र और व्यक्तिगत पसंद जैसे कारक अक्सर चर्चा में रहते हैं। लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता इस बात से भी तय होती है कि मतदाता उम्मीदवार के काम, सार्वजनिक आचरण, वादों और जवाबदेही को कितना महत्व देता है। जनता को यह समझना होगा कि वोट किसी नेता पर एहसान नहीं है। यह नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, जिसके माध्यम से वह शासन व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। इसी तरह चुनाव जीतना किसी जनप्रतिनिधि का जनता पर उपकार नहीं, बल्कि उसे सौंपी गई जिम्मेदारी है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जागरूकता मतदान केंद्र पर खत्म नहीं होती ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ पुरानी कहावत है—‘तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा।’ इस पंक्ति को लोकतंत्र के संदर्भ में देखें तो संदेश स्पष्ट है। अपने अधिकारों और सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा के लिए नागरिक को जागरूक रहना होगा। मतदान के अगले दिन से ही जनता को फिर सक्रिय होना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के कामकाज की समीक्षा करनी चाहिए, ग्रामसभा और सार्वजनिक बैठकों में भाग लेना चाहिए, सरकारी योजनाओं की जानकारी लेनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर सूचना का अधिकार इस्तेमाल करना चाहिए। यदि किसी कार्य में अनियमितता दिखाई देती है, तो बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय अभिलेखों और तथ्यों के आधार पर सवाल उठाना चाहिए। शिकायत के लिए उचित प्रशासनिक और संवैधानिक मंचों का इस्तेमाल करना चाहिए। अपनी बात शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से सामने रखनी चाहिए। यही जिम्मेदार नागरिकता है। यही वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से लोकतंत्र को केवल चुनावी व्यवस्था बने रहने से आगे बढ़ाकर जवाबदेह शासन व्यवस्था बनाया जा सकता है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ असली लड़ाई लोकतांत्रिक चेतना की है ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ लोकतंत्र में असहमति कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक विशेषता है। सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र विरोधी कदम नहीं है। बशर्ते सवाल तथ्यपरक हों, आरोप प्रमाणों पर आधारित हों और असहमति संवैधानिक दायरे में व्यक्त की जाए। ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा हो या जवाबदेही की कोई दूसरी आवाज—उसकी लोकतांत्रिक सार्थकता इस बात में है कि वह नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग करे और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता तथा शासन की पारदर्शिता पर सार्थक चर्चा को आगे बढ़ाए। आज जरूरत मतदाता जागरूकता की परिभाषा को व्यापक बनाने की है। मतदान के दिन जागना जरूरी है, लेकिन मतदान के बाद जागते रहना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। वोट देने के बाद मतदाता को अपना अधिकार, अपनी अपेक्षाएं और अपने सवाल नहीं भूलने चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र केवल इस बात से मजबूत नहीं होता कि जनता किसे चुनती है; वह इस बात से भी मजबूत होता है कि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करती है। अब समय है कि मतदाता कहे—हमने आपको चुना है, इसलिए हमारे सवालों का जवाब दीजिए। वादा किया था, तो उसके पूरा होने का हिसाब भी दीजिए। सत्ता आपकी हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र जनता का है। वोट दीजिए, लेकिन वोट देने के बाद अपने अधिकारों को मत भूलिए। प्रतिनिधि चुनिए, लेकिन उसके कामकाज की निगरानी करना भी सीखिए। क्योंकि लोकतंत्र में असली ताकत केवल वोट डालने में नहीं, बल्कि वोट की गरिमा और जनता की आवाज को पूरे कार्यकाल में जीवित रखने में है।संपादकीय का केंद्रीय संदेश: लोकतंत्र में मतदाता की भूमिका मतदान के दिन समाप्त नहीं होती। चुनाव में भागीदारी के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही, सार्वजनिक धन की निगरानी और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता भी जरूरी है।