Politics
जब पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय और प्रभाव की दौड़ बन जाए, तब लोकतंत्र सवाल पूछता है”
"जब पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय और प्रभाव की दौड़ बन जाए, तब लोकतंत्र सवाल पूछता है” जीवन पत्रकारिता को ही समर्पित कर रखा है। वहीँ आज कुछ तथाकथित पत्रकारों ने मीडिया को ग्लैमर की दुनिया और कमाई का साधन बना रखा है अपनी धाक जमाने व गाड़ी पर प्रेस लिखाने के अलावा इन्हें पत्रकारिता या किसी से कुछ लेना देना नहीं होता क्यूंकि सिर्फ प्रेस ही काफी है गाड़ी पर नम्बर की ज़रूरत नहीं, किसी कागज़ की ज़रूरत नहीं, हेलमेट की ज़रूरत नहीं मानो सारे नियम व क़ानून इनके लिए शून्य हो क्यूंकि सभी इनसे डरते जो हैं चाहे नेता हो, अधिकारी हो, कर्मचारी हो, पुलिस हो, अस्पताल हो सभी जगह बस इनकी धाक ही धाक रहती है, इतना ही नहीं अवैध कारोबारियों व अन्य भ्रष्टाचारी अधिकारियों, कर्मचारियों आदि लोगों से धन उगाही कर व हफ्ता वसूल कर अपनी जेबों को भर कर ऐश-ओ-आराम की ज़िन्दगी जीना पसंद करते हैं, खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं, और भ्रष्टाचार को मिटाने का ढिंढोरा समाज के सामने पीटते हैं मानो यही सच्चे पत्रकार हो सभी लोग इनके डर से आतंकित रहते हैं कुछ तथाकथित पत्रकार तो यहाँ तक हद करते हैं कि सच्चे, ईमानदार और अपने कार्य के लिए समर्पित रहने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को सुकून से उनका काम भी नहीं करने देते ऐसे ही लोग जनता में सच्चे पत्रकारों की छवि को धूमिल कर रहे है। आज हद तो यह है कि आपराधिक मानसिकता के व्यक्ति अपने कारोबार को संरक्षण देने के लिए पत्रकारिता में प्रवेश कर रहे हैं जिससे भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार को बढ़ावा मिल रहा है और हमारा लोकतंत्र दिन-प्रतिदिन खोखला हो रहा है जो आज नहीं तो कल हमारे लिए घातक सिद्ध होगा। पत्रकारिता समाज का आईना होती है जो समाज की अच्छाई व बुराई को समाज के सामने लाती है अब यदि पत्रकार और बुराई के बीच में सेटिंग हो जाती है तो न अच्छाई समाज के सामने आयेगी और न ही बुराई। पत्रकारिता के गिरते स्तर में ज़्यादा ज़िम्मेदारी किसकी? पत्रकारिता में थ्योरी तो कई हैं, लेकिन आजकल इस थ्योरी से ही सबकी पहचान हो जाती है। डिग्री में अंतर हो सकता है कि कौन कितने प्रतिशत अजेंडा बनाम सही ख़बर कर रहा है, लेकिन हैं तो लगभग सभी मोटिवेटेड ही। पत्रकारिता जब पढ़ाई जाती है तो एक और टर्म आता है ‘स्लैंट देना’। मतलब ख़बर को किस झुकाव के साथ परोसा जाए। एथिक्स का भी एक पेपर होता है, लेकिन उसका उतना ही मतलब है जितना हमारे स्कूली जीवन में नैतिक शिक्षा का होता है। हर आदमी दूसरों को एथिकल देखना चाहता है, खुद नहीं होता। आज के दौर में एथिक्स, निष्पक्षता और ‘वाचडॉग’ का महत्व मीडिया पर होने वाले सेमिनार और चर्चाओं में ही सिमट कर रहा गया है।