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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ: भारत में मीडिया की अत्यंत दयनीय स्थिति
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ: भारत में मीडिया की अत्यंत दयनीय स्थिति लेखक: यदुवंशी ननकू यादव पत्रकार मध्यप्रदेश: पत्रकारिता को सदैव लोकतंत्र का "चौथा स्तंम" कहा जाता रहा है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया वह शक्ति है जो सत्ता को जवाबदेह बनाती है, जनता की आवाज़ उठाती है और तथ्यों पर आधारित निष्पक्ष जानकारी प्रदान करती है । लेकिन आज की स्थिति यह है कि भारत में यह चौथा स्तंभ अपने अस्तित्व की जंग लड़ने को मजबूर है और इसकी स्थिति अत्यंत दयनीय बन चुकी है । वर्तमान रैंकिंग: एक चिंतनशील तथ्य विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) 2026 में भारत को 180 देशों में 157वाँ स्थान मिला है । यह रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा 30 अप्रैल, 2026 को जारी की गई है । 2025 की तुलना में भारत की रैंकिंग छह स्थान गिरकर 151 से 157 हो गई है, जो देश में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति पर गहरी चिंता को दर्शाता है । भारत अब भी RSF की रिपोर्ट में "बहुत गंभीर" श्रेणी में शामिल है । मीडिया की स्थिति दयनीय क्यों है? मुख्य कारण 1. राजनीतिक और कारोबारी स्वामित्व का बढ़ता प्रभाव भारत को उन देशों की सूची में रखा गया है जहाँ मीडिया स्वामित्व राजनीतिक और कारोबारी घरानों के हाथों में सिमट गया है । RSF ने विशेष रूप से मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के मीडिया क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव का उल्लेख किया है 2014 के बाद से भारत का मीडिया "अनौपचारिक आपातकाल" जैसी स्थिति में है, जहाँ बड़े घराने और सरकार के बीच नजदीकी संबंधों ने मीडिया बहुलता को खतरे में डाल दिया है 2. पत्रकारों पर बढ़ते आतंक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन 2025 में भयानक तथ्य सामने आए: 9 पत्रकारों की हत्या और 33 पत्रकारों पर आक्रमण लगभग 15,000 instances of free speech violations दर्ज किए गए 11,385 instances of censorship और 208 mass censorship व criminal cases 117 नागरिकों की अस्त्र 3,070 instances of internet shutdown और 785 blocking orders 3. विश्वसनीयता में गिरावट और भरोसे का घाव भारतीय मीडिया की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह स्वयं को सूचना प्रदाता से अधिक एक उन्माद फैलाने वाले मंच के रूप में प्रस्तुत कर रहा है । "न्यूज स्टूडियो" युद्ध के मैदान में तब्दील हो चुके हैं और एंकर कम, सेनापति अधिक लगते हैं फेक न्यूज़ में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी एआई-निर्मित कंटेंट का दुरुपयोग, डीपफेक वीडियो और सोशल मीडिया का दबाव -growing trust deficit in media outlets 4. मीडिया ध्रुवीकरण और समाज पर भरोसे का कमजोर होना मीडिया के तेजी से हो रहे ध्रुवीकरण ने भारत और शायद पूरे विश्व में दिनोदिन खबरों पर समाज के भरोसे को कम किया है । अखबारों व टेलीविजन चैनलों के रूप में पत्रकारिता को कभी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में माना जाता था, वह आज हर रोज स्वार्थ साधने वाली खबरों के प्रकाशित होने से लोगों की छानबीन व पुष्टि का मोहताज बन गया है । 5. संवैधानिक दर्जा नहीं भारत में मीडिया को लोकतंत्र का "चौथा स्तंभ" कहा जाता है, लेकिन संविधान में इसे किसी भी स्थान पर आधिकारिक दर्जा नहीं मिला है । केवल इसे एक नाम दे दिया गया है। हालांकि भारत में मीडिया को अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संरक्षण मिलता है । मीडिया का मूल उद्देश्य संकट में मीडिया के अस्तित्व का सबसे जरूरी उद्देश्य संकट में है । मीडिया का काम न सिर्फ खबरें देना होता है, बल्कि: सरकार की नीतियों की समीक्षा करना जनता की आवाज़ उठाना सत्ता को जवाबदेह बनाना विश्व शांति एवं विश्व बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करना लेकिन कुछ क्षुद्र लाभों के कारणवश कुछ मीडिया संस्थान अपनी विश्वसनीयता एवं गरिमा खोते जा रहे हैं । निष्कर्ष: चौथा स्तंभ अब अस्तित्व की जंग लड़ रहा है भारत, जहाँ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वहाँ आज पत्रकारिता अपने अस्तित्व और वर्चस्व के लिए जूझ रही है । 180 देशों में 151वाँ (2025) और अब 157वाँ (2026) स्थान हमे यहाँ सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ की भारत इस स्थिति में आ गया है । यह गिरावट इसलिए गंभीर है क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और ऐसे देश में प्रेस को "लोकतंत्र का चौथा स्तंभ" कहा जाता है । अगर यह चौथा स्तंभ भी ढह गया, तो लोकतंत्र के बाकी तीनों स्तंभों पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। आवश्यकता है: मीडिया स्वामित्व में बहुलता लाना पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना फेक न्यूज़ पर कठोर राब्ता मीडिया की विश्वसनीयता बढ़ाना संवैधानिक दर्जा देने पर विचार करना मीडिया को फिर से वह गरिमा और विश्वसनीयता वापस मिलनी चाहिए, जो उसे लोकतंत्र का वास्तविक चौथा स्तंभ बनाने के लिए आवश्यक है।